२८ फरवरी २०११, आज ही के दिन नौ साल पहले सुब्ह के ग्यारह बजे डॉक्टर साहब मेरे पास आये और बोले, “I AM SORRY!” वो पहली बार था जब ज़िंदगी में मैंने कोई माफ़ी स्वीकार नहीं की, या कर नहीं पाया।
मैं अस्पताल के उस कमरे के एक कोने मे खड़ा था। उन्नीस साल का वो लड़का जो थोड़ा डरा हुआ तो था, मगर आने वाली हर परिस्थितियों के लिए तैयार भी था। क्यूँ की कहीं ना कहीं वो जानता था कि क्या होने वाला है।
नाम के रिश्तेदार बहार ही बैठे थे। अस्पताल में हमेशा कि तरह बहुत शांति थी। मगर मेरे अंदर एक तूफ़ान चल रहा था। डॉक्टरों कि सारी कोशिशें नाकाम रही, और उन्होंने आकर मुझसे वो कहा जो कहने मे वो झिझक रहे थे, “पापा नहीं रहे।”
मैं कुछ बोल नहीं पाया। शायद अल्फ़ाज़ नहीं थे, या वो समय नहीं था कुछ कहने का। मैंने उस बिस्तर कि तरफ देखा जिसके पास मैं पिछली सात रातों से बिना सोये बैठा था। सब कुछ मेरी आँखों के सामने था पर मैं देखना नहीं चाहता था। उस वक़्त कुछ समझ नहीं आया। मुझे कुछ वक़्त अकेले रहना था।
मैं भागते हुए अस्पताल कि छत पर गया। कुछ पलों तक आसमान को ही देखता रहा। बहुत साल लगे पर समझ आ गया के वो लड़का उस वक़्त शायद उन्हें जाते हुए देख रहा था। क़रीबन दस मिनट तक रोया, क्यूँ की उसके लिए भी वक़्त नहीं था मेरे पास। ज़िम्मेदारियों का एहसास बचपन से ही था। मेरी जगह अगर कोई और होता तो शायद उसी छत पे रोता रहता। पर कई बार आँसू पोंछ कर ज़िंदगी का सामना कर लेना चाइये।
एक अरसा लगा पर मैंने सब ठीक कर दिया। यक़ीन मानिये आसान तो नहीं था। पर शायद ये मैं पहले से जानता था। क्यूँ की दस साल पहले मैंने ही अपनी ज़िंदगी कि पहली शायरी मैं इस बात का ज़िक्र किया था।
“ज़िंदगी कभी आसान नहीं होती, और जो आसान होती है वो ज़िंदगी नहीं होती।”